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एनआरसी के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति

नगरिकता  संशोधन बिल को लेकर देश के राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर है । विपक्ष याने कि कांग्रेस और उसके सहयोगी वामपंथी दलों का मानना है कि इस बिल  से मस्लिम सामुदाय को अलग रखा गया है और उसके साथ ना इंसाफी हुई है । जहाँ तक भारत में रहने वाले मुसलमानों का सवाल है तो वो भारत के नागरिक हैं और उन्हें मतदान का हक है । फर्क पड़ता है तो देश में रह रहे घुसपेथियों को ।

बिल  सदन के दोनो पटलों लोकसभा एवं राज्य सभा में बहुमत से पास हुआ है । कांग्रेस और वामपंथी लोगों का मानना है कि इस विघेयक का लागू किया जाना भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 का उलंधन है और देश को धार्मिक आधार पर बांटने की साजिश है । बिल  के विरोध में देश भर में रैलियाँ एवं विरोध प्रदर्शन मीडिया की सुर्खियों में है ।

जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के छात्रों का बिल  के विरोध में सड़क पर उतरना और हिंसक वारदातों का अंजाम देना यह सोचने को मजबूर कर देता है क्या वास्तव में देश का मुस्लिम सामुदाय असुरक्षित है या फिर चंद फिरकापरस्तों की मामले को हवा देने की मात्र एक साजिश है । राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर याने कि एनआरसी से पता चलता है कि कौन देश का नागरिक है और कौन नहीं । जिनके नाम इस रजिस्टर में नहीं होते उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है ।

हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित भारत बचाओ रैली का अन्य मुददों के साथ यह भी एक महत्वपूर्ण एजेंडा है । देश के मुस्लमानों के हितों के बजाये बाहरी मुस्लमानों की मुखालफत के लिये जन आंदोलन मात्र फिरकापरस्ती एवं राजनीतिक हितों के लिये  अल्पसंख्यकों को गुमराह करना अमलियत तौर पर सही नहीं है ।

अपनी माँगों को मनवाने के लिये धरना प्रदर्शन आम है विचारणीय है तो राजनीतिक तुष्टिकरण से प्रेरित शिक्षण स्थलों में पनपती हिंसक मांसिक्ता...